sd24 news network, provides latest news, Current Affairs, Lyrics, Jobs headlines from Business, Technology, Bollywood, Cricket, videos, photos, live news

Tuesday, September 28, 2021

#बाइज़्ज़त_बरी - किस्से जो किताब का हिस्सा न बन सके

बाइज़्ज़त_बरी - किस्से जो किताब का हिस्सा न बन सके

SD24 News Network - #बाइज़्ज़त_बरी - किस्से जो किताब का हिस्सा न बन सके

यह तस्वीर कश्मीर से तारिक डार साहब की है। तारिक डार जॉन्सन एंड जॉन्सन कंपनी में ऊंचे ओहदे पर काम कर रहे थे कि दिल्ली के सरोजनी नगर बम धमाके के आरोप में उन्हें धोखे से गिरफ्तार कर लिया गया। पढ़े-लिखे इस नौजवान के 17 साल सलाखों के पीछे गल गए। उनकी कहानी जानने के लिए हमने दो दिन उनके घर पर उनके परिवार के साथ बिताए। 



डिनर पर यहां वहां की बातें होती। एक रात रहमाना (लाल किले अटैक की आरोपी जिनकी कहानी हमारी किताब में है।) का ज़िक्र हुआ तो वह कहने लगे कि अरे उन्हें तो मैं अच्छे से जानता हूं क्योंकि उनके शौहर अश्फाक और मैं  तिहाड़ जेल में एक ही सेल में थे। अश्फाक अभी भी तिहाड़ जेल में हैं जबकि रहमाना बाइज्ज़त बरी हो चुकी हैं। वह हमसे रहमाना का हाल चाल रहे थे कि हमने बताया कि वह बहुत बुरी स्थिति में हैं। न तो उनकी हेल्थ ठीक रहती है और न उनके साथ कोई है। उनके परिवार ने पूरी तरह से उनसे किनारा कर रखा है, उनका कॉल तक नहीं लेते हैं। पैसे की तंगी से भी जूझ रही हैं।  

खाना खाने के बाद तारिक डार और उनकी बेगम बाहर गए।  कुछ देर में तारिक हमारे पास आकर बैठ गए और फिर उनकी बेगम आईं और उन्होंने  एक पैकेट मेरे हाथ में दिया। मैंने पूछा कि इसमें क्या है। तारिक डार बोले कि इसे रहमाना को दे दिजिएगा। 'लेकिन है क्या इसमें ?' उन्होंने बोला कि इसमें कुछ रुपये हैं आप उन तक पहुंचा दें और उनसे बोल दें कि वह हमारे पास कश्मीर मेरे घर आ जाएं ताउम्र हमारे पास घर में मेरी बहन की तरह रहें। 

बता दें कि तारिक डार को रिहा होने के बाद भी कोई नौकरी नहीं मिली। उनका खुद का घर मुश्किल से चल रहा था। उनकी बेगम एक स्कूल या कॉलेज में वॉर्डन की नौकरी करती थीं, उनकी उस तनख्वाह से घर के अहम खर्च  चल रहे थे। उसी दिन उनकी बेगम को तनख्वाह मिली थी, जैसे पैकेट मिला वैसे ही सीलड पैकेट उन्होंने हमें दे दिया। मैं नहीं जानती कि तारिक का वह महीना कैसे गया होगा या उन्होंने कैसे मैनेज किया होगा। लेकिन मदद के लिए इतना बड़ा जिगर लाना मुश्किल है। 

यही नहीं जब हमने वह पैकेट रहमाना जी को दिया तो वह शर्म से पानी पानी हो रही थी। जबकि उन्हें पैसे की सख्त जरूरत थी। बहुत मुश्किल से कांपते हाथों से उन्होंने वह पैकेट लिया। लग रहा था कि इसे लेने से अच्छा है कि वह मर जाएं। 

हम उस समाज का हिस्सा हैं जहां हम दूसरों की मेहनत के छोटे छोटे पैसे मार लेते हैं, नहीं देते हैं लेकिन एक वह समाज भी है जो नहीं सोचता कि वह कल क्या खाएगा लेकिन दूसरे की मदद के लिए सारा पैसा दे दिया, वह समाज भी है जिसने उस पैसे को बहुत मुश्किल से स्वीकार किया जबकि उसे एक एक पाई की ज़रूरत थी। कहां से लाते हैं यह लोग इतनी ईमानदारी, मदद और दूसरे का दर्द महसूस करने का ऐसा जज़्बा, मोम की तरह पिघले हुए इंसानियत से लबरेज़ ऐसे लोगों से मुलाकातों ने हमें भी और इंसानियत और निस्वार्थ सेवाभाव से भर दिया।
Manisha Bhalla

No comments:

Recent Comments